योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



रामकृष्ण ने नेह-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछा, ‘‘नरेन्द्र, तू क्या चाहता है?’’

उसने उत्तर दिया, ‘‘शुकदेव की तरह निर्विकल्प समाधि के द्वारा सदैव सच्चिानन्द-सागर में डूबे रहना चाहता हूं।’’

रामकृष्ण नरेन्द्र को चाहे सबसे अधिक चाहते थे, पर वह क्रुद्व स्वर में बोले, ‘‘बार-बार यही बात कहते तुझे लज्जा नहीं आती? समय आने पर कहां तू वटवक्ष की तरह बढ़कर सैकड़ों लोगों को शान्ति की छाया देगा, और कहां आज अपनी मुक्ति के लिए व्यस्त हो उठा। इतना क्षुद्र आदर्श तेरा?’’


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रामकृष्ण ने नेह-भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछा, ‘‘नरेन्द्र, तू क्या चाहता है?’’

उसने उत्तर दिया, ‘‘शुकदेव की तरह निर्विकल्प समाधि के द्वारा सदैव सच्चिानन्द-सागर में डूबे रहना चाहता हूं।’’

रामकृष्ण नरेन्द्र को चाहे सबसे अधिक चाहते थे, पर वह क्रुद्व स्वर में बोले, ‘‘बार-बार यही बात कहते तुझे लज्जा नहीं आती? समय आने पर कहां तू वटवक्ष की तरह बढ़कर सैकड़ों लोगों को शान्ति की छाया देगा, और कहां आज अपनी मुक्ति के लिए व्यस्त हो उठा। इतना क्षुद्र आदर्श तेरा?’’


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