नरेन्द्र की विशाल आंखों में आंसु डबडबा आंए और वह आग्रहपूर्वक बोला, ‘निर्विकल्प समाधि न होने तक मेरा मन किसी भी तरह शान्त नहीं होने का और यदि वह न हुआ तो मैं वह सब कुछ भी न कर सकूंगा।’’
‘‘तू क्या अपनी इच्छा से करेगा? जगदम्बा तेरी गर्दन पकड़कर करा लेंगी। तू न करे-तेरी हड्डियां करेंगी।’’
पर नरेन्द्र की प्रार्थना को वह टाल नहीं पाए। अन्त में बोले, ‘‘अच्छा जा, निर्विकल्प समाधि होगी।
एक दिन शाम को ध्यान करते-करते नरेन्द्र
नरेन्द्र की विशाल आंखों में आंसु डबडबा आंए और वह आग्रहपूर्वक बोला, ‘निर्विकल्प समाधि न होने तक मेरा मन किसी भी तरह शान्त नहीं होने का और यदि वह न हुआ तो मैं वह सब कुछ भी न कर सकूंगा।’’
‘‘तू क्या अपनी इच्छा से करेगा? जगदम्बा तेरी गर्दन पकड़कर करा लेंगी। तू न करे-तेरी हड्डियां करेंगी।’’
पर नरेन्द्र की प्रार्थना को वह टाल नहीं पाए। अन्त में बोले, ‘‘अच्छा जा, निर्विकल्प समाधि होगी।
एक दिन शाम को ध्यान करते-करते नरेन्द्र