योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अकस्मात निर्विकल्प समाधि में डूब गया। शिष्यों ने देखा तो उन्हें लगा कि नरेन्द्र मर गया है। वे दौड़े-दौड़े रामकृष्ण के पास आए। लेकिन उनकी बात सुनकर भी रामकृष्ण शांत रहे। थोड़ी देर बाद नरेन्द्र की चेतना लौट आई। उसका मुख-मंडल आनन्द से खिला हुआ था। उसने आकर रामकृष्ण को प्रणाम किया। वे बोले, ‘‘बस, अब तालाबंद, कुंजी मां के पास रहेगी। काम समाप्त होने पर फिर खोल दिया जाएगा।’’

दिन-रात गाना-भजन चलता रहा। नरेन्द्र भावोन्मत्त होकर रामकृष्ण,


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अकस्मात निर्विकल्प समाधि में डूब गया। शिष्यों ने देखा तो उन्हें लगा कि नरेन्द्र मर गया है। वे दौड़े-दौड़े रामकृष्ण के पास आए। लेकिन उनकी बात सुनकर भी रामकृष्ण शांत रहे। थोड़ी देर बाद नरेन्द्र की चेतना लौट आई। उसका मुख-मंडल आनन्द से खिला हुआ था। उसने आकर रामकृष्ण को प्रणाम किया। वे बोले, ‘‘बस, अब तालाबंद, कुंजी मां के पास रहेगी। काम समाप्त होने पर फिर खोल दिया जाएगा।’’

दिन-रात गाना-भजन चलता रहा। नरेन्द्र भावोन्मत्त होकर रामकृष्ण,


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