सीताराम, चैतन्यदेव के लीला संबंधी गीत गाकर भक्तों को आनन्द प्रदान करता रहा। उधर रामकृष्ण काली से प्रार्थना करने लगे, ‘‘मां, उसकी अद्वैत की अनुभूति को तू अपनी माया-शक्ति के द्वारा ढक रख। मुझे तो अभी उससे अनेक काम कराने हैं।’’
जो बारह शिष्य घर-बार छोड़कर काशीपुर में रहते थे, गुरू-सेवा करते-करते उनमें प्रेम संबंध दृढ़ हो गया। एक दिन इसी उद्यान-भवन में रामकृष्ण संघ की नींव रखी गई। अपने इन तरूण शिष्यों को गेरूआ वस्त्र पहनाकर
सीताराम, चैतन्यदेव के लीला संबंधी गीत गाकर भक्तों को आनन्द प्रदान करता रहा। उधर रामकृष्ण काली से प्रार्थना करने लगे, ‘‘मां, उसकी अद्वैत की अनुभूति को तू अपनी माया-शक्ति के द्वारा ढक रख। मुझे तो अभी उससे अनेक काम कराने हैं।’’
जो बारह शिष्य घर-बार छोड़कर काशीपुर में रहते थे, गुरू-सेवा करते-करते उनमें प्रेम संबंध दृढ़ हो गया। एक दिन इसी उद्यान-भवन में रामकृष्ण संघ की नींव रखी गई। अपने इन तरूण शिष्यों को गेरूआ वस्त्र पहनाकर