रामकृष्ण ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी और उनके नेता नरेन्द्र से कहा, ‘‘क्या तुम लोग सम्पूर्ण निराभिमान बनकर भिक्षा की झोली कन्धे पर लिये राजपथों पर भिक्षा मांग सकोगे?’’
52 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वे लोग उसी समय भिक्षा मांगने निकल पड़े। उसी कलकत्ता में जिसमें उनका जन्म हुआ था और जिस कलकत्ता में जाने क्या-क्या सपने मन में संजोकर उन्होंने पढ़ना-लिखना शुरू किया था, अब सन्यासी बनकर गली-गली भिक्षा मांगी। जो अन्न मिला,
रामकृष्ण ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी और उनके नेता नरेन्द्र से कहा, ‘‘क्या तुम लोग सम्पूर्ण निराभिमान बनकर भिक्षा की झोली कन्धे पर लिये राजपथों पर भिक्षा मांग सकोगे?’’
52 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वे लोग उसी समय भिक्षा मांगने निकल पड़े। उसी कलकत्ता में जिसमें उनका जन्म हुआ था और जिस कलकत्ता में जाने क्या-क्या सपने मन में संजोकर उन्होंने पढ़ना-लिखना शुरू किया था, अब सन्यासी बनकर गली-गली भिक्षा मांगी। जो अन्न मिला,