उसे पकाकर उन्होंने परमहंस के सामने रखा और फिर प्रसाद ग्रहण किया। उस दिन रामकृष्ण के आनन्द का ठिकाना न था।
रामकृष्ण की तबीयत बीच में एक बार कुछ सुधरी थी, उसके बाद हालत बिगड़ती चली गई। रोमां रोलां लिखते हैं, ‘‘नरेन उनके (शिष्यों) कार्य और उनकी प्रार्थनाओं का निर्देशन करते थे। उन्होंने गुरू से भी प्रार्थना की कि उनके स्वास्थ्य-लाभ की प्रार्थना में वे भी योग दें। समान विचारों के एक पंडित के आगमन से उनके आग्रह को और भी बल मिला।
उसे पकाकर उन्होंने परमहंस के सामने रखा और फिर प्रसाद ग्रहण किया। उस दिन रामकृष्ण के आनन्द का ठिकाना न था।
रामकृष्ण की तबीयत बीच में एक बार कुछ सुधरी थी, उसके बाद हालत बिगड़ती चली गई। रोमां रोलां लिखते हैं, ‘‘नरेन उनके (शिष्यों) कार्य और उनकी प्रार्थनाओं का निर्देशन करते थे। उन्होंने गुरू से भी प्रार्थना की कि उनके स्वास्थ्य-लाभ की प्रार्थना में वे भी योग दें। समान विचारों के एक पंडित के आगमन से उनके आग्रह को और भी बल मिला।