योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

शिष्य की आत्मा के प्रवाह को मुक्त न कर दिया होता।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 34)

रामकृष्ण को आशंका थी कि अगर असाधारण युवक नरेन्द्र को वेदान्त-शिक्षा न दी गई तो उसकी प्रतिभा एकांगी बनी रहेगी।

और वह उसे अपना एक धर्म, एक सम्प्रदाय संगठित करने में नष्ट कर सकता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि नरेन्द्र अगर रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में न आया होता तो उसकी बुद्वि में द्वैत, विशिष्टाद्वेत और अद्वैत का अतीत और वर्तमान तथा प्राच्य और पाश्चात्य का जो समन्वय हुआ, वह शायद न हो पाता।


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शिष्य की आत्मा के प्रवाह को मुक्त न कर दिया होता।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 34)

रामकृष्ण को आशंका थी कि अगर असाधारण युवक नरेन्द्र को वेदान्त-शिक्षा न दी गई तो उसकी प्रतिभा एकांगी बनी रहेगी।

और वह उसे अपना एक धर्म, एक सम्प्रदाय संगठित करने में नष्ट कर सकता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि नरेन्द्र अगर रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में न आया होता तो उसकी बुद्वि में द्वैत, विशिष्टाद्वेत और अद्वैत का अतीत और वर्तमान तथा प्राच्य और पाश्चात्य का जो समन्वय हुआ, वह शायद न हो पाता।


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