था और इस कारण भी उनका घर पर रहना आवश्यक हो गया था। फिर घर वालों की जीविका चलाने वाले वही थे। लेकिन विवेकानन्द के इस उदाहरण को लेकर कुछ दूसरे संन्यासी भी घर लौटकर परिवार वालों के साथ रहने और परीक्षा की तैयारी करने लगे। दूसरे मठ के टूट जाने का खतरा पैदा हो गया। अब नरेन्द्र चैंके। मठ टूट जाएगा तो गुरू जो कार्य सौंप गए हैं, वह कैसे सम्पन्न होगा और संघ नहीं रहेगा तो उनके विचार हवा में बिखर जाएंगे। लिखा हैः
‘‘तभी यह अनुभव
था और इस कारण भी उनका घर पर रहना आवश्यक हो गया था। फिर घर वालों की जीविका चलाने वाले वही थे। लेकिन विवेकानन्द के इस उदाहरण को लेकर कुछ दूसरे संन्यासी भी घर लौटकर परिवार वालों के साथ रहने और परीक्षा की तैयारी करने लगे। दूसरे मठ के टूट जाने का खतरा पैदा हो गया। अब नरेन्द्र चैंके। मठ टूट जाएगा तो गुरू जो कार्य सौंप गए हैं, वह कैसे सम्पन्न होगा और संघ नहीं रहेगा तो उनके विचार हवा में बिखर जाएंगे। लिखा हैः
‘‘तभी यह अनुभव