योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

हुआ कि इन विचारों का नाश होने देने के बदले कहीं यह श्रेयस्कर है कि कुछ मुट्ठी-भर लोग स्वयं अपने को मिटाते रहें।

क्या बिगड़ जाएगा यदि एक मां न रही, यदि दो भाई मर गए तो? यह तो बलिदान है, यह तो करना ही होगा। बिना बलिदान के कोई भी महान कार्य सिद्व नहीं हो सकता। कलेजे को बाहर निकालना होगा और निकालकर पूजा की वेदी पर उसे लहूलुहान चढ़ा देना होगा।’’ (वि. सा, पृष्ठ 11)

सब बातों को जानते हुए भी कार्य रूप में परिणत करना सहज नहीं


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हुआ कि इन विचारों का नाश होने देने के बदले कहीं यह श्रेयस्कर है कि कुछ मुट्ठी-भर लोग स्वयं अपने को मिटाते रहें।

क्या बिगड़ जाएगा यदि एक मां न रही, यदि दो भाई मर गए तो? यह तो बलिदान है, यह तो करना ही होगा। बिना बलिदान के कोई भी महान कार्य सिद्व नहीं हो सकता। कलेजे को बाहर निकालना होगा और निकालकर पूजा की वेदी पर उसे लहूलुहान चढ़ा देना होगा।’’ (वि. सा, पृष्ठ 11)

सब बातों को जानते हुए भी कार्य रूप में परिणत करना सहज नहीं


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