था। मनुष्य पर पूर्व संस्कारों के जाने कितने बंधन होते हैं-सभी ज़ंजीरों को एक साथ तोड़ देना सम्भव नहीं। विवेकानन्द का पहलवान शरीर भी उन्हें नहीं तोड़ पाया। लेकिन अब सभी पारिवारिक संबंधों को झटककर उन्होंने तेईस-चैबीस बरस की आयु में 1886 के दिसम्बर में स्थायी रूप में मठ में आकर रहना शुरू किया।
विवेकानन्द के बारे में दूसरों के मन में जो संदेह तथा भ्रम-भ्रातियां उत्पन्न होने लगी थी, वे उनके वराहनगर मठ में आकर रहने से दूर हो गई। जो युवा संन्सासी अपने-अपने घर चले गये थे,
था। मनुष्य पर पूर्व संस्कारों के जाने कितने बंधन होते हैं-सभी ज़ंजीरों को एक साथ तोड़ देना सम्भव नहीं। विवेकानन्द का पहलवान शरीर भी उन्हें नहीं तोड़ पाया। लेकिन अब सभी पारिवारिक संबंधों को झटककर उन्होंने तेईस-चैबीस बरस की आयु में 1886 के दिसम्बर में स्थायी रूप में मठ में आकर रहना शुरू किया।
विवेकानन्द के बारे में दूसरों के मन में जो संदेह तथा भ्रम-भ्रातियां उत्पन्न होने लगी थी, वे उनके वराहनगर मठ में आकर रहने से दूर हो गई। जो युवा संन्सासी अपने-अपने घर चले गये थे,