सतर्क रखते और उनके मन को निरन्तर चेताते रहते। मानवीय चिंतन के आत्म-ग्रंथ पढ़कर उन्हें सुनाते, विश्वात्मा के विकास का सहस्य समझाते, सभी मुख्य धार्मिक और दार्शनिक समस्याओं पर नीरस किन्तु उत्ोजित वाद-विवाद के लिए बाध्य करते, निरन्तर उस असीम सत्य के विशाल क्षितिज की ओर प्रेरित करते चलते जो जातियों और सम्प्रदायों से बड़ा है, जिसमें सभी विशिष्ट सत्य एकाकार हो जाते हैं।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 64)
इसी प्रकार डेढ़ साल बीत गया। लेकिन
सतर्क रखते और उनके मन को निरन्तर चेताते रहते। मानवीय चिंतन के आत्म-ग्रंथ पढ़कर उन्हें सुनाते, विश्वात्मा के विकास का सहस्य समझाते, सभी मुख्य धार्मिक और दार्शनिक समस्याओं पर नीरस किन्तु उत्ोजित वाद-विवाद के लिए बाध्य करते, निरन्तर उस असीम सत्य के विशाल क्षितिज की ओर प्रेरित करते चलते जो जातियों और सम्प्रदायों से बड़ा है, जिसमें सभी विशिष्ट सत्य एकाकार हो जाते हैं।’’ (विवेकानन्द, पृष्ठ 64)
इसी प्रकार डेढ़ साल बीत गया। लेकिन