अब एक नई प्रवत्िा ने सिर उठाया। उत्साह और जिज्ञासा से ओत-प्रोत तरूण संन्यासी कब तक नीरस वाद-विवाद में उलझे और निर्जीव पुस्तकों से सिर पटकते रहते। पुस्तक ज्ञान आवश्यक होते हुए भी पुस्तक मानव अनुभव का संकलन मात्र है। इन युवा संन्यासियों को भी मठ की चारदीवारी से बाहर निकलकर विस्तृत संसार का अनुभव-सरस और सजीव ज्ञान प्राप्त करना था। उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस ने पुस्तकें नहीं पढ़ी थी। उन्होंने शास्त्र तथा संस्कृति का ज्ञान मौखिक
अब एक नई प्रवत्िा ने सिर उठाया। उत्साह और जिज्ञासा से ओत-प्रोत तरूण संन्यासी कब तक नीरस वाद-विवाद में उलझे और निर्जीव पुस्तकों से सिर पटकते रहते। पुस्तक ज्ञान आवश्यक होते हुए भी पुस्तक मानव अनुभव का संकलन मात्र है। इन युवा संन्यासियों को भी मठ की चारदीवारी से बाहर निकलकर विस्तृत संसार का अनुभव-सरस और सजीव ज्ञान प्राप्त करना था। उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस ने पुस्तकें नहीं पढ़ी थी। उन्होंने शास्त्र तथा संस्कृति का ज्ञान मौखिक