योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

रूप से ग्रहण किया था और फिर उस ज्ञान को हास-परिहास और श्लेषमयी भाषा में सरस और सजीव बनाकर मौखिक रूप ही से भक्तों तक पहुंचाया था। उनके शिष्य मात्र पुस्तक-ज्ञान तक सीमित रहकर अपने को कैसे निर्जीव और आदर्शहीन बना लें। इसलिए दो-एक संन्यासी चुपचाप बिना कानों-कान खबर किए तीर्थ-भ्रमण को चल दिए। फिर एक दिन जब विवेकानन्द किसी काम से कलकत्ता गए हुए थे बहुत छोटी उम्र का संन्यासी सारदाप्रसन्न (स्वामी त्रिगुनातीतानन्द) गुप्त रूप से


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रूप से ग्रहण किया था और फिर उस ज्ञान को हास-परिहास और श्लेषमयी भाषा में सरस और सजीव बनाकर मौखिक रूप ही से भक्तों तक पहुंचाया था। उनके शिष्य मात्र पुस्तक-ज्ञान तक सीमित रहकर अपने को कैसे निर्जीव और आदर्शहीन बना लें। इसलिए दो-एक संन्यासी चुपचाप बिना कानों-कान खबर किए तीर्थ-भ्रमण को चल दिए। फिर एक दिन जब विवेकानन्द किसी काम से कलकत्ता गए हुए थे बहुत छोटी उम्र का संन्यासी सारदाप्रसन्न (स्वामी त्रिगुनातीतानन्द) गुप्त रूप से


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