रूप से ग्रहण किया था और फिर उस ज्ञान को हास-परिहास और श्लेषमयी भाषा में सरस और सजीव बनाकर मौखिक रूप ही से भक्तों तक पहुंचाया था। उनके शिष्य मात्र पुस्तक-ज्ञान तक सीमित रहकर अपने को कैसे निर्जीव और आदर्शहीन बना लें। इसलिए दो-एक संन्यासी चुपचाप बिना कानों-कान खबर किए तीर्थ-भ्रमण को चल दिए। फिर एक दिन जब विवेकानन्द किसी काम से कलकत्ता गए हुए थे बहुत छोटी उम्र का संन्यासी सारदाप्रसन्न (स्वामी त्रिगुनातीतानन्द) गुप्त रूप से
रूप से ग्रहण किया था और फिर उस ज्ञान को हास-परिहास और श्लेषमयी भाषा में सरस और सजीव बनाकर मौखिक रूप ही से भक्तों तक पहुंचाया था। उनके शिष्य मात्र पुस्तक-ज्ञान तक सीमित रहकर अपने को कैसे निर्जीव और आदर्शहीन बना लें। इसलिए दो-एक संन्यासी चुपचाप बिना कानों-कान खबर किए तीर्थ-भ्रमण को चल दिए। फिर एक दिन जब विवेकानन्द किसी काम से कलकत्ता गए हुए थे बहुत छोटी उम्र का संन्यासी सारदाप्रसन्न (स्वामी त्रिगुनातीतानन्द) गुप्त रूप से