के कर्मकांड और ज्ञानकांड-दो पक्ष हैं; आदर्शवादी विचारधारा और भौतिकवादी विचारधारा एक ही सिक्के के दो पहलू है। जब तक आदर्शवादी विचारधारा और उसके विकास प्रक्रिया को भी भली-भांति समझ न लेना सम्भव नहीं है। सिर्फ माक्र्सवाद-लेनिनवाद और माओ त्से तुंग विचारधारा पढ़ लेने से जो एकपक्षीय समझ बनती है, उससे आदमी कठमुल्ला और रूढ़िवादी बन जाता है।
त्रासदी यह है कि हमारे ये तथाकथित वामपक्षी न माक्र्सवाद को समझते हैं
और न अध्यात्मवाद
के कर्मकांड और ज्ञानकांड-दो पक्ष हैं; आदर्शवादी विचारधारा और भौतिकवादी विचारधारा एक ही सिक्के के दो पहलू है। जब तक आदर्शवादी विचारधारा और उसके विकास प्रक्रिया को भी भली-भांति समझ न लेना सम्भव नहीं है। सिर्फ माक्र्सवाद-लेनिनवाद और माओ त्से तुंग विचारधारा पढ़ लेने से जो एकपक्षीय समझ बनती है, उससे आदमी कठमुल्ला और रूढ़िवादी बन जाता है।
त्रासदी यह है कि हमारे ये तथाकथित वामपक्षी न माक्र्सवाद को समझते हैं
और न अध्यात्मवाद