को। उन्होंने उल्टे-सीधे दो-चार वाक्य रटकर अपना सरलीकरण कर लिया है। वे और कुछ जानने की ज़रूरत ही महसुस नहीं करते। करें भी क्यों, जानने के लिए जानमारी करनी पड़ती है। चूहे की तरह हल्दी की एक गांठ लेकर पंसारी बन बैठना बहुत आसान है। हमारे इन दोस्तांे की भी यही हालत है। वे अपने दो-चार रटे-रटाए वाक्यों ही को देश की सारी समस्याओं का हल बता रहे हैं।
विवेकानन्द ने ज्ञानकांड को कर्मकांड से अलग करके उसकी तात्िवक मीमांसा की है और
को। उन्होंने उल्टे-सीधे दो-चार वाक्य रटकर अपना सरलीकरण कर लिया है। वे और कुछ जानने की ज़रूरत ही महसुस नहीं करते। करें भी क्यों, जानने के लिए जानमारी करनी पड़ती है। चूहे की तरह हल्दी की एक गांठ लेकर पंसारी बन बैठना बहुत आसान है। हमारे इन दोस्तांे की भी यही हालत है। वे अपने दो-चार रटे-रटाए वाक्यों ही को देश की सारी समस्याओं का हल बता रहे हैं।
विवेकानन्द ने ज्ञानकांड को कर्मकांड से अलग करके उसकी तात्िवक मीमांसा की है और