यहां पर रहना मेरे लिए असम्भव हो गया है। कौन जाने किस समय मन की गति बदल जाए। मैं बीच-बीच में माता-पिता, घर, स्वजन आदि के स्वप्न देखता हूं। मैं स्वप्न में मूर्तिमति माया द्वारा प्रलोभित हो रहा हूं। मैंने काफी सहन किया
57 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
है, यहां तक कि प्रबल आकर्षण के कारण मुझे दो बार घर जाकर स्वजनों से मिलना पड़ा है। अतः अब यहां रहना किसी भी तरह उचित नहीं है, माया के पंजे से छुटकारा पाने के लिए दूर देश में जाने के अलावा और गति नहीं है।’’
यहां पर रहना मेरे लिए असम्भव हो गया है। कौन जाने किस समय मन की गति बदल जाए। मैं बीच-बीच में माता-पिता, घर, स्वजन आदि के स्वप्न देखता हूं। मैं स्वप्न में मूर्तिमति माया द्वारा प्रलोभित हो रहा हूं। मैंने काफी सहन किया
57 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
है, यहां तक कि प्रबल आकर्षण के कारण मुझे दो बार घर जाकर स्वजनों से मिलना पड़ा है। अतः अब यहां रहना किसी भी तरह उचित नहीं है, माया के पंजे से छुटकारा पाने के लिए दूर देश में जाने के अलावा और गति नहीं है।’’