योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



विवेकानन्द ने पत्र पढ़कर समाप्त किया तो वह एक ज़बर्दस्त झटका लगा और एक और ज़ंजीर टूटकर गिर पड़ी। सोचा, ‘ये तो सभी तीर्थ-भ्रमण का आग्रह कर रहे हैं। इससे तो मठ का नाश हो जाएगा। ठीक है, होने दो। मैं कौन हूं, इन्हें बांधकर रखनेवाला ?’ उनका अपना मन पिछले दो बरस से उड़ निकलने के लिए छअपटा रहा था। यह क्या कि उन्होंने घर-द्वार की चांदी की ज़ंजीर तोड़ दी और अब यह संघ की सोने की ज़ंजीर पहने रखें! इस प्रकार एक साथ रहते सभी धीरे-धीरे माया


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विवेकानन्द ने पत्र पढ़कर समाप्त किया तो वह एक ज़बर्दस्त झटका लगा और एक और ज़ंजीर टूटकर गिर पड़ी। सोचा, ‘ये तो सभी तीर्थ-भ्रमण का आग्रह कर रहे हैं। इससे तो मठ का नाश हो जाएगा। ठीक है, होने दो। मैं कौन हूं, इन्हें बांधकर रखनेवाला ?’ उनका अपना मन पिछले दो बरस से उड़ निकलने के लिए छअपटा रहा था। यह क्या कि उन्होंने घर-द्वार की चांदी की ज़ंजीर तोड़ दी और अब यह संघ की सोने की ज़ंजीर पहने रखें! इस प्रकार एक साथ रहते सभी धीरे-धीरे माया


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