के बंधन में आबद्व हुए जा रहे हैं। अतएव स्वयं उन्होंने भी मठ छोड़कर दूर चले जाने का संकल्प कर लिया। गुुरू-भाइयों का अनुरोध उन्हें रोक नहीं पाया। वे मां (रामकृष्ण की विधवा पत्नी शारदामणि) का आशीर्वाद लेकर तीर्थ-भ्रमण को निकल पड़े।
अब व्यवस्था यह की गई कि दल का एक भाग हमेशा मठ में बना रहेगा। शशि (स्वामी रामकृष्णनन्द) स्थायी रूप से मठ में रहकर उसका संचालन करते रहे। उन्होंने कभी उससे बाहर कदम नहीं रखा। वे मठ की धुरी और उसके
के बंधन में आबद्व हुए जा रहे हैं। अतएव स्वयं उन्होंने भी मठ छोड़कर दूर चले जाने का संकल्प कर लिया। गुुरू-भाइयों का अनुरोध उन्हें रोक नहीं पाया। वे मां (रामकृष्ण की विधवा पत्नी शारदामणि) का आशीर्वाद लेकर तीर्थ-भ्रमण को निकल पड़े।
अब व्यवस्था यह की गई कि दल का एक भाग हमेशा मठ में बना रहेगा। शशि (स्वामी रामकृष्णनन्द) स्थायी रूप से मठ में रहकर उसका संचालन करते रहे। उन्होंने कभी उससे बाहर कदम नहीं रखा। वे मठ की धुरी और उसके