एकनिष्ठ संरक्षक थे। दूसरे शिष्य चले जाते और घूम-घूमकर फिर इसी नीड़ में लौट आते थे।
विवेकानन्द 1888 के प्रथम भाग में वराहनगर में परिब्राजक रूप में भ्रमण के लिए चले। बिहार और उत्तर प्रदेश में घूमते हुए वे मुख्य तीर्थ काशी पहुंचे और वहां कुछ दिन रूकने का निश्चय करके द्वारकादास आश्रम में रहने लगे। जप, ध्यान, साधु संग और विद्वानों से शास्त्र चर्चा उनका नित्य कर्म था। एक दिन किसी सज्जन ने उनका परिचय पंडित भूदेव मुखोपाध्याय
एकनिष्ठ संरक्षक थे। दूसरे शिष्य चले जाते और घूम-घूमकर फिर इसी नीड़ में लौट आते थे।
विवेकानन्द 1888 के प्रथम भाग में वराहनगर में परिब्राजक रूप में भ्रमण के लिए चले। बिहार और उत्तर प्रदेश में घूमते हुए वे मुख्य तीर्थ काशी पहुंचे और वहां कुछ दिन रूकने का निश्चय करके द्वारकादास आश्रम में रहने लगे। जप, ध्यान, साधु संग और विद्वानों से शास्त्र चर्चा उनका नित्य कर्म था। एक दिन किसी सज्जन ने उनका परिचय पंडित भूदेव मुखोपाध्याय