चरित्र की आलोचना की तो विवेकानन्द ने निर्भीक दृढ़ता से उसका खंडन किया। स्वामी भास्करानन्द
58 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की बड़ी धाक थी। राजे, महाराजे, पंडित तथा ज्ञानी उनके चरण छूकर कृतार्थ होते थे। तरूण संन्यासी विवेकानन्द के साहस और तर्क से सब विस्मित रह गए। भास्करानन्द उदार हृदय संन्यासी थे। उन्होंने अपने शिष्यों तथा उपस्थित व्यक्तियों से कहा, ‘‘इसके कंठ में सरस्वती विराजमान है, इसके हृदय में ज्ञानालोक प्रदीप्त हुआ
चरित्र की आलोचना की तो विवेकानन्द ने निर्भीक दृढ़ता से उसका खंडन किया। स्वामी भास्करानन्द
58 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की बड़ी धाक थी। राजे, महाराजे, पंडित तथा ज्ञानी उनके चरण छूकर कृतार्थ होते थे। तरूण संन्यासी विवेकानन्द के साहस और तर्क से सब विस्मित रह गए। भास्करानन्द उदार हृदय संन्यासी थे। उन्होंने अपने शिष्यों तथा उपस्थित व्यक्तियों से कहा, ‘‘इसके कंठ में सरस्वती विराजमान है, इसके हृदय में ज्ञानालोक प्रदीप्त हुआ