है।’’ गुरू के संबंध में अनादरसूचक शब्द विवेकानन्द से सहन नहीं हुए, वे तुरंत वहां से चले आए।
कुछ दिन काशी में रहकर विवेकानन्द वराहनगर मठ में लौट आए। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार लिखते हैंः
‘‘वाराणसी हिन्दू-भारत का हृदय-केन्द्र है। यहां मद्रासी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, महाराष्ट्रीय, उत्तर प्रदेशीय व्यक्तिगत आचार-व्यवहार और भाषा की भिन्नता के बावजुद एक ही भाव के भावुक बनकर भगवान विश्वनाथ के मंदिर में सम्मिलित होते हैं। काशी धाम में स्वामी जी ने पारमार्थिकता से भ्रष्ट,
है।’’ गुरू के संबंध में अनादरसूचक शब्द विवेकानन्द से सहन नहीं हुए, वे तुरंत वहां से चले आए।
कुछ दिन काशी में रहकर विवेकानन्द वराहनगर मठ में लौट आए। सत्येन्द्रनाथ मजूमदार लिखते हैंः
‘‘वाराणसी हिन्दू-भारत का हृदय-केन्द्र है। यहां मद्रासी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, महाराष्ट्रीय, उत्तर प्रदेशीय व्यक्तिगत आचार-व्यवहार और भाषा की भिन्नता के बावजुद एक ही भाव के भावुक बनकर भगवान विश्वनाथ के मंदिर में सम्मिलित होते हैं। काशी धाम में स्वामी जी ने पारमार्थिकता से भ्रष्ट,