इस कल्याणव्रत की साधना के लिए केवल स्वार्थ त्याग की नहीं, बल्कि सर्वस्व त्याग करना होगा। यहां तक कि उन्हें अपनी मुक्ति की कामना तक को भूल जाना होगा।’’ (विवेकानन्द चरित्र, पृष्ठ 146)
मठ से विवेकानन्द दोबारा काशी आए तो उनके एक गुरू-भाई अखंडानन्द ने उनका परिचय प्रभदादास मित्र से करा दिया। प्रभदादास संस्कृत भाषा, साहित्य और वेदान्त दर्शन के प्रकांड पंडित थे। इनसे विवेकानन्द कितने प्रभावित हए और उनके मन में इनके प्रति कितनी श्रद्वा उत्पन्न हुई,
इस कल्याणव्रत की साधना के लिए केवल स्वार्थ त्याग की नहीं, बल्कि सर्वस्व त्याग करना होगा। यहां तक कि उन्हें अपनी मुक्ति की कामना तक को भूल जाना होगा।’’ (विवेकानन्द चरित्र, पृष्ठ 146)
मठ से विवेकानन्द दोबारा काशी आए तो उनके एक गुरू-भाई अखंडानन्द ने उनका परिचय प्रभदादास मित्र से करा दिया। प्रभदादास संस्कृत भाषा, साहित्य और वेदान्त दर्शन के प्रकांड पंडित थे। इनसे विवेकानन्द कितने प्रभावित हए और उनके मन में इनके प्रति कितनी श्रद्वा उत्पन्न हुई,