इसका अनुमान वराहनगर, कलकत्ता से 17 अगस्त, 1889 को लिखे पत्र से सहज में लगाया जा सकता है। उन्हें ‘पूज्यवाद’, से सम्बोधित करते हुए लिखा है।:
‘‘आपने पिछले पत्र में लिखा है कि जब मैं आपको आदरसूचक शब्दों से संबोधित करता हूं, तो आपको बहुत संकोच होता है। किन्तु इसमें मेरा कुछ दोष नहीं। इसका उत्तरदायित्व तो आपके सद्गुणों पर है। मैंने इस पत्र के पूर्व एक पत्र लिखा था कि आपके सद्गुणों से जो मैं आपकी ओर आकृष्ट होता हूं, उससे यह
इसका अनुमान वराहनगर, कलकत्ता से 17 अगस्त, 1889 को लिखे पत्र से सहज में लगाया जा सकता है। उन्हें ‘पूज्यवाद’, से सम्बोधित करते हुए लिखा है।:
‘‘आपने पिछले पत्र में लिखा है कि जब मैं आपको आदरसूचक शब्दों से संबोधित करता हूं, तो आपको बहुत संकोच होता है। किन्तु इसमें मेरा कुछ दोष नहीं। इसका उत्तरदायित्व तो आपके सद्गुणों पर है। मैंने इस पत्र के पूर्व एक पत्र लिखा था कि आपके सद्गुणों से जो मैं आपकी ओर आकृष्ट होता हूं, उससे यह