प्रतीत होता है कि हमारा और आपका कुछ पूर्व जन्म का सम्बंध है। इस सम्बंध में मैं एक गृहस्थ और संन्यासी में कोई भेद नहीं मानता और जहां कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शान्ति पाता हूं, वहां मेरा मस्तक श्रद्वा से नत हो जाता है। आजकल जितने लोग संन्यास ग्रहण करते हैं, वे ऐसे लोग हैं
59 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जो वास्तव में मान-सम्मान के भूखे हैं, जीवन-निर्वाह के निमित्त त्याग का दिखावा करते हैं और जो गृहस्थ और संन्यास,
प्रतीत होता है कि हमारा और आपका कुछ पूर्व जन्म का सम्बंध है। इस सम्बंध में मैं एक गृहस्थ और संन्यासी में कोई भेद नहीं मानता और जहां कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शान्ति पाता हूं, वहां मेरा मस्तक श्रद्वा से नत हो जाता है। आजकल जितने लोग संन्यास ग्रहण करते हैं, वे ऐसे लोग हैं
59 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जो वास्तव में मान-सम्मान के भूखे हैं, जीवन-निर्वाह के निमित्त त्याग का दिखावा करते हैं और जो गृहस्थ और संन्यास,