योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

के साथ और सबके सामने-चाहे देश हो या विदेश। इसके अतिरिक्त मेरी विचारधारा में बहुत विकृति आ गई है-मैं एक निर्गुण पूर्ण ब्रह्म को देखता हूं, यदि वे ही व्यक्ति ईश्वर के नाम से पुकारे जाएं तो मैं इस विचार को ग्रहण कर सकता हूं, परंतु बौद्विक सिद्वान्तों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता।’’

जब बौद्विक अंतर बढ़ जाए तो आपसी संबंध पुराने पड़ जाते हैं। तब उन पुराने संबंधों को झटककर आगे बढ़ जाना ही बेहतर होता है।


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के साथ और सबके सामने-चाहे देश हो या विदेश। इसके अतिरिक्त मेरी विचारधारा में बहुत विकृति आ गई है-मैं एक निर्गुण पूर्ण ब्रह्म को देखता हूं, यदि वे ही व्यक्ति ईश्वर के नाम से पुकारे जाएं तो मैं इस विचार को ग्रहण कर सकता हूं, परंतु बौद्विक सिद्वान्तों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता।’’

जब बौद्विक अंतर बढ़ जाए तो आपसी संबंध पुराने पड़ जाते हैं। तब उन पुराने संबंधों को झटककर आगे बढ़ जाना ही बेहतर होता है।


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