60 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
आगरा और फतेहपुर सीकरी में उन्होंने मुगल इमारतों का शिल्प सौंदर्य देखा और फिर आगे बढ़े। वृन्दावन के मार्ग में उन्हांेने देखा कि एक व्यक्ति किनारे बैठा तम्बाकू पी रहा है। उनका मन भी कश लगाने को ललचाया और हाथ बढ़ाकर उस आदमी से चिलम मांगी। ‘‘महाराज, मैं भंगी हूं।’’ वह संस्कार-भीरू व्यक्ति बोला। ‘‘मेहतर!’’ विवेकानन्द के भी जन्मगत संस्कार आड़े आए और बढ़ा हुआ हाथ पीछे हट गया। जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए वे आगे बढ़े,
60 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
आगरा और फतेहपुर सीकरी में उन्होंने मुगल इमारतों का शिल्प सौंदर्य देखा और फिर आगे बढ़े। वृन्दावन के मार्ग में उन्हांेने देखा कि एक व्यक्ति किनारे बैठा तम्बाकू पी रहा है। उनका मन भी कश लगाने को ललचाया और हाथ बढ़ाकर उस आदमी से चिलम मांगी। ‘‘महाराज, मैं भंगी हूं।’’ वह संस्कार-भीरू व्यक्ति बोला। ‘‘मेहतर!’’ विवेकानन्द के भी जन्मगत संस्कार आड़े आए और बढ़ा हुआ हाथ पीछे हट गया। जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए वे आगे बढ़े,