योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पर कुछ ही दूर गए होंगे कि मन ने धिक्कारा, ‘‘अरे, तूने तो जाति, कुल, मान सभी को त्याग कर संन्यास ले लिया उस व्यक्ति के पास आए। उससे चिलम भरवाकर बड़े प्रेम और आनन्द से तम्बाकू पिया। इसके बाद अपनी यात्रा में वे भंगी, चमारों के झोंपड़ों में रातों ठहरे और उनके मन में छुआछूत का विचार फिर कभी नहीं आया।

वृन्दावन में थोड़े दिन रहकर जब वे हाथरस आए तो वहां के नौजवान स्टेशन मास्टर शरच्चन्द्र गुप्ता से अचानक उनकी भेंट हो गई। शरद उन्हें


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पर कुछ ही दूर गए होंगे कि मन ने धिक्कारा, ‘‘अरे, तूने तो जाति, कुल, मान सभी को त्याग कर संन्यास ले लिया उस व्यक्ति के पास आए। उससे चिलम भरवाकर बड़े प्रेम और आनन्द से तम्बाकू पिया। इसके बाद अपनी यात्रा में वे भंगी, चमारों के झोंपड़ों में रातों ठहरे और उनके मन में छुआछूत का विचार फिर कभी नहीं आया।

वृन्दावन में थोड़े दिन रहकर जब वे हाथरस आए तो वहां के नौजवान स्टेशन मास्टर शरच्चन्द्र गुप्ता से अचानक उनकी भेंट हो गई। शरद उन्हें


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