योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

इसलिए वह बीमार पड़ गया। विवेकानन्द उसे अपने कंधों पर उठाए-उठाए जंगलों में घूमते रहे। अन्त में वे आप भी बीमार पड़ गए और शिष्यों को साथ लेकर हाथरस लौट आए। गुप्त परिवार और उत्साही युवकों की सेवा सुश्रूषा-से वे स्वस्थ हुए। पहले वह और कुछ दिन बाद सदानन्द भी अगस्त 1888 में वराहनगर मठ में आ गया और रामकृष्ण संघ में सम्मिलित हो गया।

अब विवेकानन्द लगभग एक बरस तक वराहनगर मठ तथा बाग बाज़ार कलकत्ता में बलराम बसु के मकान पर रहे। यह समय उन्होंने गुरू-भाइयों के साथ वेदान्त,


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इसलिए वह बीमार पड़ गया। विवेकानन्द उसे अपने कंधों पर उठाए-उठाए जंगलों में घूमते रहे। अन्त में वे आप भी बीमार पड़ गए और शिष्यों को साथ लेकर हाथरस लौट आए। गुप्त परिवार और उत्साही युवकों की सेवा सुश्रूषा-से वे स्वस्थ हुए। पहले वह और कुछ दिन बाद सदानन्द भी अगस्त 1888 में वराहनगर मठ में आ गया और रामकृष्ण संघ में सम्मिलित हो गया।

अब विवेकानन्द लगभग एक बरस तक वराहनगर मठ तथा बाग बाज़ार कलकत्ता में बलराम बसु के मकान पर रहे। यह समय उन्होंने गुरू-भाइयों के साथ वेदान्त,


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