पाणिनि व्याकरण तथा शास्त्रों के अध्ययन में बिताया। इस बीच में उन्होंने प्रभदादास मित्रों को पत्र लिखे, उनसे मठ के जीवन, कार्य और उनको अपनी मनःस्थिति पर भली भांति प्रकाश पड़ता है। प्रभदादास ने इन संन्यासियों को वेदान्त तथा अष्टाध्यायी के गं्रथ दान दिए थे। इसके लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विवेकानन्द ने उन्हें 19 नवम्बर, 1888 को लिखा था:
‘‘अपने ‘वेदान्त’ का उपहार भेजकर न केवल मुझे, वरन् श्रीराम-कृष्ण के समस्त संन्यासी-मंडल
पाणिनि व्याकरण तथा शास्त्रों के अध्ययन में बिताया। इस बीच में उन्होंने प्रभदादास मित्रों को पत्र लिखे, उनसे मठ के जीवन, कार्य और उनको अपनी मनःस्थिति पर भली भांति प्रकाश पड़ता है। प्रभदादास ने इन संन्यासियों को वेदान्त तथा अष्टाध्यायी के गं्रथ दान दिए थे। इसके लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विवेकानन्द ने उन्हें 19 नवम्बर, 1888 को लिखा था:
‘‘अपने ‘वेदान्त’ का उपहार भेजकर न केवल मुझे, वरन् श्रीराम-कृष्ण के समस्त संन्यासी-मंडल