योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

की दरिद्रता और मकान के झगड़े का उल्लेख करके आगे लिखा हैः ‘‘कलकत्ता के पास रहकर मुझे अपनी आंखों उनकी दुख-अवस्था देखनी पड़ती है। उस समय मेरे मन में रजोगुण जाग्रत हो उठता है और मेरा अहंभाव कभी-कभी उस भावना में परिणित हो जाता है, जिसके कारण कार्य-क्षेत्र में कूद पड़ने की प्रेरणा होती है। ऐसे क्षणों में मैं अपने मन में एक भंयकर अंतद्र्वन्द्व का अनुभव करता हूं। यही कारण है कि मैंने लिखा था कि मेरे मन की स्थिति भीषण है। अब उनका


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की दरिद्रता और मकान के झगड़े का उल्लेख करके आगे लिखा हैः ‘‘कलकत्ता के पास रहकर मुझे अपनी आंखों उनकी दुख-अवस्था देखनी पड़ती है। उस समय मेरे मन में रजोगुण जाग्रत हो उठता है और मेरा अहंभाव कभी-कभी उस भावना में परिणित हो जाता है, जिसके कारण कार्य-क्षेत्र में कूद पड़ने की प्रेरणा होती है। ऐसे क्षणों में मैं अपने मन में एक भंयकर अंतद्र्वन्द्व का अनुभव करता हूं। यही कारण है कि मैंने लिखा था कि मेरे मन की स्थिति भीषण है। अब उनका


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