उद्यानयुक्त तथा दो चिमनियों से सुशोभित उनके निवास स्थान को देख आया हूं, भीतर जाने का कोई उपाय नहीं। लोगों का कहना है कि भीतर
63 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
गुफा यानी तह खाना जैसी एक कोठरी है, जिसमें वे रहते हैं, वे क्या करते हैं, यह वे ही जानते हैं, क्योंकि कभी किसी से देखा नहीं। एक दिन मैं यहां बैठा-बैठा कड़ी सर्दी खाकर लौटा था, फिर भी मैं यत्न करूंगा।’’ इसके बाद 4 फरवरी, 7 फरवरी के पत्र इस प्रकार हैं:
‘‘बड़े भाग्य
उद्यानयुक्त तथा दो चिमनियों से सुशोभित उनके निवास स्थान को देख आया हूं, भीतर जाने का कोई उपाय नहीं। लोगों का कहना है कि भीतर
63 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
गुफा यानी तह खाना जैसी एक कोठरी है, जिसमें वे रहते हैं, वे क्या करते हैं, यह वे ही जानते हैं, क्योंकि कभी किसी से देखा नहीं। एक दिन मैं यहां बैठा-बैठा कड़ी सर्दी खाकर लौटा था, फिर भी मैं यत्न करूंगा।’’ इसके बाद 4 फरवरी, 7 फरवरी के पत्र इस प्रकार हैं:
‘‘बड़े भाग्य