योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

बाहर आने पर ही वे दूसरों से बातचीत करते हैं। किसी को यह मालूम नहीं कि वे क्या खाते-पीते हैं। इसीलिए लोग उन्हें पवहारी (पवन का आहार करने वाले) बाबा कहते हैं। एक बार जब वे पांच साल तक गुफा से बाहर नहीं निकले, तो लोगों ने समझा कि उन्होंने शरीर त्याग दिया है। किन्तु वे फिर उठ आए। पर अब वे लोगों ने के सामने निकलते नहीं और बातचीत भी द्वार के भीतर ही से करते हैं। इतनी मीठी वाणी मैंने कहीं नहीं सुनी, वे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते,


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बाहर आने पर ही वे दूसरों से बातचीत करते हैं। किसी को यह मालूम नहीं कि वे क्या खाते-पीते हैं। इसीलिए लोग उन्हें पवहारी (पवन का आहार करने वाले) बाबा कहते हैं। एक बार जब वे पांच साल तक गुफा से बाहर नहीं निकले, तो लोगों ने समझा कि उन्होंने शरीर त्याग दिया है। किन्तु वे फिर उठ आए। पर अब वे लोगों ने के सामने निकलते नहीं और बातचीत भी द्वार के भीतर ही से करते हैं। इतनी मीठी वाणी मैंने कहीं नहीं सुनी, वे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते,


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