योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

बल्कि कहते हैं ‘दास क्या जाने?’ परन्तु बात करते-करते मानों उनके मुख से अग्नि के समान तेजस्वी वाणी निकलती है। मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने ने कहा, ‘‘कुछ दिन यहां ठहरकर मुझे कृतार्थ कीजिए। परन्तु वे इस तरह कभी नहीं कहते। इसलिए मैंने यह समझा कि मुझे आश्वासन देना चाहते हैं और जब कभी मैं हठ करता हूं, मुझे ठहरने के लिए कहते हैं। वे निस्संदेह बड़े विद्वान हैं, पर कुछ प्रकट नहीं होता। वे शास्त्रोक्त कर्मकाण्ड करते हैं। पूर्णिमा


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बल्कि कहते हैं ‘दास क्या जाने?’ परन्तु बात करते-करते मानों उनके मुख से अग्नि के समान तेजस्वी वाणी निकलती है। मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने ने कहा, ‘‘कुछ दिन यहां ठहरकर मुझे कृतार्थ कीजिए। परन्तु वे इस तरह कभी नहीं कहते। इसलिए मैंने यह समझा कि मुझे आश्वासन देना चाहते हैं और जब कभी मैं हठ करता हूं, मुझे ठहरने के लिए कहते हैं। वे निस्संदेह बड़े विद्वान हैं, पर कुछ प्रकट नहीं होता। वे शास्त्रोक्त कर्मकाण्ड करते हैं। पूर्णिमा


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