में वे अच्छे-चैड़े तथा दोहरे शरीर के थे। उनके एक ही आंख
64 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
थी और अपनी वास्तविक उम्र में वे कुछ प्रतीत होते थे। उनकी आवाज़ इतनी मधुर थी कि हमने वैसी आवाज़ अभी तक नहीं सुनी। अपने जीवन के शेष इस वर्ष या इससे भी कुछ अधिक समय से, वे लोगों को फिर दिखाई नहीं पड़े। उनके दरवाजे़ के पीछे कुछ आलू तथा थोड़ा-सा मक्खन रख दिया जाता था और रात को किसी समय जब वे समाधि में न होकर अपने ऊपर वाले कमरे में होते थे,
में वे अच्छे-चैड़े तथा दोहरे शरीर के थे। उनके एक ही आंख
64 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
थी और अपनी वास्तविक उम्र में वे कुछ प्रतीत होते थे। उनकी आवाज़ इतनी मधुर थी कि हमने वैसी आवाज़ अभी तक नहीं सुनी। अपने जीवन के शेष इस वर्ष या इससे भी कुछ अधिक समय से, वे लोगों को फिर दिखाई नहीं पड़े। उनके दरवाजे़ के पीछे कुछ आलू तथा थोड़ा-सा मक्खन रख दिया जाता था और रात को किसी समय जब वे समाधि में न होकर अपने ऊपर वाले कमरे में होते थे,