लोगों ने दरवाज़ा तोड़ डाला और देखा कि इस महायोगी ने स्वयं को पूर्णाहुति की रूप में उस होमाग्नि को समर्पित कर दिया है थोड़े ही समय में उनका वह शरीर भस्म राशि में परिणत हो गया।’’
‘‘प्रस्तुत लेखक इस परलोकगत संत के प्रति नरम ऋणी है। इस लेखक ने जिन श्रेष्ठतम आचार्यों से प्रेम किया तथा जिनकी सेवा की है, उनमें से वे एक हैं। उनकी पवित्र स्मृति में ये पंक्तियां चाहे जैसी भी अयोग्य हों, समर्पित करता हूं।’’ (वि.सा, पृष्ठ 270-71)
लोगों ने दरवाज़ा तोड़ डाला और देखा कि इस महायोगी ने स्वयं को पूर्णाहुति की रूप में उस होमाग्नि को समर्पित कर दिया है थोड़े ही समय में उनका वह शरीर भस्म राशि में परिणत हो गया।’’
‘‘प्रस्तुत लेखक इस परलोकगत संत के प्रति नरम ऋणी है। इस लेखक ने जिन श्रेष्ठतम आचार्यों से प्रेम किया तथा जिनकी सेवा की है, उनमें से वे एक हैं। उनकी पवित्र स्मृति में ये पंक्तियां चाहे जैसी भी अयोग्य हों, समर्पित करता हूं।’’ (वि.सा, पृष्ठ 270-71)