से विवेकानन्द भूमि पर बैठ गए...सजल नेत्रों को उठाकर देखा, संदेहपूर्ण चित्त से विवेकानन्द भूमि पर बैठ गए... सजल नेत्रों को उठाकर देखा, दिव्य दर्शन-उनके जीवन के आदर्श दक्षिणेश्वर के वही अद्भुत देव मानव उनके सामने खड़े हैं। विवेकानन्द अवाक् रह गए, एक प्रहर तक पत्थर की मूर्ति की तरह वे ज़मीन पर बैठे ही रहे। प्रातःकाल हुआ। मन में संकल्प-विकल्प होने लगा कि भगवान श्री रामकृष्ण का वह दर्शन मस्तिष्क की दुर्बलता ही का फल तो नहीं
से विवेकानन्द भूमि पर बैठ गए...सजल नेत्रों को उठाकर देखा, संदेहपूर्ण चित्त से विवेकानन्द भूमि पर बैठ गए... सजल नेत्रों को उठाकर देखा, दिव्य दर्शन-उनके जीवन के आदर्श दक्षिणेश्वर के वही अद्भुत देव मानव उनके सामने खड़े हैं। विवेकानन्द अवाक् रह गए, एक प्रहर तक पत्थर की मूर्ति की तरह वे ज़मीन पर बैठे ही रहे। प्रातःकाल हुआ। मन में संकल्प-विकल्प होने लगा कि भगवान श्री रामकृष्ण का वह दर्शन मस्तिष्क की दुर्बलता ही का फल तो नहीं