योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

था ! निदान अगली रात को वे फिर से पवहारी बाबा के पास जाने को तैयार हुए। पर आज भी वही पहले की देखी हुई ज्योतिर्मयी मूर्ति उसी तरह उनके सामने खड़ी हो गई। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, लगातार इक्कीस दिन इसी प्रकार व्यतीत होने पर अंत में वे मर्मवेदना से भूमि पर लोट-पोट होकर आर्तस्वर से बोल उठे, ‘‘नहीं प्रभु, मैं और किसी के पास नहीं जाऊंगा। हे रामकृष्ण! तुम ही मेरे एक मात्र अराध्य हो, मैं तुम्हारा ही दास हूं। मेरी इन मानसिक दुर्बलता के अपराध को क्षमा करो,


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था ! निदान अगली रात को वे फिर से पवहारी बाबा के पास जाने को तैयार हुए। पर आज भी वही पहले की देखी हुई ज्योतिर्मयी मूर्ति उसी तरह उनके सामने खड़ी हो गई। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, लगातार इक्कीस दिन इसी प्रकार व्यतीत होने पर अंत में वे मर्मवेदना से भूमि पर लोट-पोट होकर आर्तस्वर से बोल उठे, ‘‘नहीं प्रभु, मैं और किसी के पास नहीं जाऊंगा। हे रामकृष्ण! तुम ही मेरे एक मात्र अराध्य हो, मैं तुम्हारा ही दास हूं। मेरी इन मानसिक दुर्बलता के अपराध को क्षमा करो,


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