योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

प्रभु।’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 161-62)

गुरू के जिस आसन पर रामकृष्ण परमहंस आसीन थे, उस पर किसी दूसरे को नहीं बिठाया जा सकता था। विवेकानन्द ने ‘गाता हूं गीत मैं तुम्हें ही सुनाने को’ कविता इसी घटना से प्रेरित होकर लिखी:

‘‘बाल-केलि करता हूं तुझसे मैं

और क्रोध करके देव

तुम से किनारा कर जाना कभी चाहता हूं

किन्तु निशा काल में

देखता हूं, तुमको मैं खड़े हुए-

चुपचाप आंखें छलछलाई हुई,

हेरते हो मेरे तुम मुख की ओर।


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प्रभु।’’ (विवेकानन्द चरित, पृष्ठ 161-62)

गुरू के जिस आसन पर रामकृष्ण परमहंस आसीन थे, उस पर किसी दूसरे को नहीं बिठाया जा सकता था। विवेकानन्द ने ‘गाता हूं गीत मैं तुम्हें ही सुनाने को’ कविता इसी घटना से प्रेरित होकर लिखी:

‘‘बाल-केलि करता हूं तुझसे मैं

और क्रोध करके देव

तुम से किनारा कर जाना कभी चाहता हूं

किन्तु निशा काल में

देखता हूं, तुमको मैं खड़े हुए-

चुपचाप आंखें छलछलाई हुई,

हेरते हो मेरे तुम मुख की ओर।


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