योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



उसी समय बदल जाता भाव मेरा

पैरों पड़ता हूं पर क्षमा नहीं मांगता,

तुम नहीं करते हो रोष।

पुत्र हूं तुम्हारा, कहो,

और कोई कैसे इस प्रगल्भता को

सहन कर सकता है?

प्रभु हो तुम मेरे, तुम प्राणसखा मेरे हो। कभी देखता हूं,

‘‘तुम मैं हो, मैं तुम हूं।’’


66 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

व्यक्ति हृदय को शान्ति देने की तुच्छ कामना। पलायन निरा पलायन! दृढ़ चरित्र, एकनिष्ठ नरेन्द्र अर्थात् विवेकानन्द के लिए यह सम्भव नहीं था। गुरू के शब्द स्मरण हो आए,


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उसी समय बदल जाता भाव मेरा

पैरों पड़ता हूं पर क्षमा नहीं मांगता,

तुम नहीं करते हो रोष।

पुत्र हूं तुम्हारा, कहो,

और कोई कैसे इस प्रगल्भता को

सहन कर सकता है?

प्रभु हो तुम मेरे, तुम प्राणसखा मेरे हो। कभी देखता हूं,

‘‘तुम मैं हो, मैं तुम हूं।’’


66 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

व्यक्ति हृदय को शान्ति देने की तुच्छ कामना। पलायन निरा पलायन! दृढ़ चरित्र, एकनिष्ठ नरेन्द्र अर्थात् विवेकानन्द के लिए यह सम्भव नहीं था। गुरू के शब्द स्मरण हो आए,


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