योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

पूरे देश की यात्रा करनी है। और जब तक यात्रा पूरी न हो जाए वे लौटकर मठ में नहीं आएंगे। गुरू-भाइयों के आग्रह के बावजुद वे अपने इस निश्चय पर अडिग रहे।

जुलाई, 1890 में वे अपने गुरू-भाई अखंडानन्द के साथ यात्रा पर रवाना हुए। वे भागलपुर से देवघर और देवघर से काशी पहुंचे। उस समय उन्हें हिमालय आकर्षित कर रहा था। इसलिए काशी में वे अधिक नहीं रूके। वे अयोध्या, नैनीताल, बद्री और केदार होते हुए अल्मोड़ा पहुंचे। समाचार पाकर वहां स्वामी


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पूरे देश की यात्रा करनी है। और जब तक यात्रा पूरी न हो जाए वे लौटकर मठ में नहीं आएंगे। गुरू-भाइयों के आग्रह के बावजुद वे अपने इस निश्चय पर अडिग रहे।

जुलाई, 1890 में वे अपने गुरू-भाई अखंडानन्द के साथ यात्रा पर रवाना हुए। वे भागलपुर से देवघर और देवघर से काशी पहुंचे। उस समय उन्हें हिमालय आकर्षित कर रहा था। इसलिए काशी में वे अधिक नहीं रूके। वे अयोध्या, नैनीताल, बद्री और केदार होते हुए अल्मोड़ा पहुंचे। समाचार पाकर वहां स्वामी


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