सरदानन्द और कृपानन्द भी उनसे आ मिले। अब वराहनगर मठ के अधिकांश संन्यासी तीर्थ-भ्रमण को निकल पड़े थे। छःसात महीने तक विभिन्न स्ािानों पर रहकर उन्होंने हिमालय के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द ग्रहण किया। कन्याकुमारी की ओर जाने के लिए फिर नीचे उतरे। मेरठ में जब वे एक सेठ के बगीचे में ठहरे हुए थे तो उनके गुरू-भाई भी एक-एक करके वहां पहुंचने लगे। यों वह बगीचा एक तरफ दूसरा वराहनगर मठ बन गया। कीर्तन, ध्यान, जप, वेदान्त की चर्चा, शास्त्रालाप और आने
सरदानन्द और कृपानन्द भी उनसे आ मिले। अब वराहनगर मठ के अधिकांश संन्यासी तीर्थ-भ्रमण को निकल पड़े थे। छःसात महीने तक विभिन्न स्ािानों पर रहकर उन्होंने हिमालय के प्राकृतिक सौंदर्य का आनन्द ग्रहण किया। कन्याकुमारी की ओर जाने के लिए फिर नीचे उतरे। मेरठ में जब वे एक सेठ के बगीचे में ठहरे हुए थे तो उनके गुरू-भाई भी एक-एक करके वहां पहुंचने लगे। यों वह बगीचा एक तरफ दूसरा वराहनगर मठ बन गया। कीर्तन, ध्यान, जप, वेदान्त की चर्चा, शास्त्रालाप और आने