67 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वालों को धर्मोपदेश नित्य की दिनचर्या हो गई। एक दिन विवेकानन्द ने सोचा, यह अच्छा खटराग है, मैं एक बंधन को तोड़कर दूसरे बंधन में पड़ गया। इसलिए उन्होंने गुरू-भाइयों को एकत्रित करके कहा, ‘मैं जल्दी इस स्थान को छोड़ रहा हूं। मेरी इच्छा अकेले यात्रा करने की है। तुममंे में कोई भी मेरे पीछे न आए।’’
फरवरी, 1891 में वे अकेले यात्रा पर चल पड़े। संक्षेप में इस यात्रा का हाल रोमां रोलां के शब्दों में पढ़िए:
67 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वालों को धर्मोपदेश नित्य की दिनचर्या हो गई। एक दिन विवेकानन्द ने सोचा, यह अच्छा खटराग है, मैं एक बंधन को तोड़कर दूसरे बंधन में पड़ गया। इसलिए उन्होंने गुरू-भाइयों को एकत्रित करके कहा, ‘मैं जल्दी इस स्थान को छोड़ रहा हूं। मेरी इच्छा अकेले यात्रा करने की है। तुममंे में कोई भी मेरे पीछे न आए।’’
फरवरी, 1891 में वे अकेले यात्रा पर चल पड़े। संक्षेप में इस यात्रा का हाल रोमां रोलां के शब्दों में पढ़िए: