‘‘उनका यात्रा-पथ उन्हें राजपूताना, अलवर (फरवरी-मार्च) जयपुर, अजमेर, खेतरी, अहमदाबाद और काठियावाड़ (सितम्बर के अंतिम दिन) जूनागढ़ और गुजरात, पोरबंदर (आठ-नौ महीने का प्रवास) द्वारका, पालिताना (खम्भाते की खाड़ी से सटा मंदिर-बहुल नगर) रियासत बड़ौदा, खंडवा, बम्बई, पूना, बेलगाम (अक्टूबर, 1892) बंगलौर, कोचिन, मालाबार, रियासत त्रिवांकुर, तिरूअनन्तपुरम, मदुरा ले गया। उन्होंने विराट भारतीय अन्तरीप का अंतिम छोर छू लिया, जहां दक्षिण का वाराणसी,
‘‘उनका यात्रा-पथ उन्हें राजपूताना, अलवर (फरवरी-मार्च) जयपुर, अजमेर, खेतरी, अहमदाबाद और काठियावाड़ (सितम्बर के अंतिम दिन) जूनागढ़ और गुजरात, पोरबंदर (आठ-नौ महीने का प्रवास) द्वारका, पालिताना (खम्भाते की खाड़ी से सटा मंदिर-बहुल नगर) रियासत बड़ौदा, खंडवा, बम्बई, पूना, बेलगाम (अक्टूबर, 1892) बंगलौर, कोचिन, मालाबार, रियासत त्रिवांकुर, तिरूअनन्तपुरम, मदुरा ले गया। उन्होंने विराट भारतीय अन्तरीप का अंतिम छोर छू लिया, जहां दक्षिण का वाराणसी,