योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

रामायण का रामेश्वरम है और फिर उसके भी आगे कन्याकुमारी की समाधि तक वे चलते चले गए। (1892 के अंतिम दिन)

‘‘उत्तर से दक्षिण तक भारत की प्राचीन भूमि पर देवी-देवता बिखरे पड़े थे। किन्तु उनकी असंख्य भुजाओं की अभेद्य परिधि केवल एक ईश्वर की प्रतीक थी। विवेकानन्द ने प्राण और मूर्ति की अनन्यता को समझा। उन्होंने उसे समझा सवर्ण और वर्णहीन, सभी प्राणियों से प्रत्यालाप करके। और यही नहीं, उन्हें भी इसे समझना सिखाया। उन्होंने एक से दूसरे


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रामायण का रामेश्वरम है और फिर उसके भी आगे कन्याकुमारी की समाधि तक वे चलते चले गए। (1892 के अंतिम दिन)

‘‘उत्तर से दक्षिण तक भारत की प्राचीन भूमि पर देवी-देवता बिखरे पड़े थे। किन्तु उनकी असंख्य भुजाओं की अभेद्य परिधि केवल एक ईश्वर की प्रतीक थी। विवेकानन्द ने प्राण और मूर्ति की अनन्यता को समझा। उन्होंने उसे समझा सवर्ण और वर्णहीन, सभी प्राणियों से प्रत्यालाप करके। और यही नहीं, उन्हें भी इसे समझना सिखाया। उन्होंने एक से दूसरे


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