खोज में एक दिन भी थककर रूकी नहीं और उसने भारत की मिट्टी में बिखरी, छिपी समस्त विचारधाराओं को धारण किया क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि उन सबका उद्गम एक है। एक ओर खड़े पानी के दुर्गंध कीच में लिप्त पुराण-पंथियों की अंधी श्रद्वा से और दूसरी तरफ अज्ञात शक्ति के रहस्यमय स्त्रोत को, अनजाने ही; अवरूद्व करने में संलग्न ब्रह्यसमाजी सुधारकों की पथभ्रष्ट वैज्ञानिकता से, वे एक समान दूर रहना चाहते थे। विवेकानन्द चाहते थे कि धर्मप्राण
खोज में एक दिन भी थककर रूकी नहीं और उसने भारत की मिट्टी में बिखरी, छिपी समस्त विचारधाराओं को धारण किया क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि उन सबका उद्गम एक है। एक ओर खड़े पानी के दुर्गंध कीच में लिप्त पुराण-पंथियों की अंधी श्रद्वा से और दूसरी तरफ अज्ञात शक्ति के रहस्यमय स्त्रोत को, अनजाने ही; अवरूद्व करने में संलग्न ब्रह्यसमाजी सुधारकों की पथभ्रष्ट वैज्ञानिकता से, वे एक समान दूर रहना चाहते थे। विवेकानन्द चाहते थे कि धर्मप्राण