ने विदेश-यात्रा से लौटकर अपने मद्रास के भाषण में प्रसंगवश कहा थाः
एक बात और। मैंने समाज-सुधारकों के मुख-पत्र में पढ़ा कि मैं शुद्र हूं, और मुझसे पूछा गया था कि एक शुद्र को संन्यासी होने का क्या अधिकार है? तो इस पर मेरा उत्तर यह है कि मैं उन महापुरूष का वंशधर हूं, जिनके चरण्कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है, और जिनके वंशज विशुद्व क्षत्रिय है। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो,
ने विदेश-यात्रा से लौटकर अपने मद्रास के भाषण में प्रसंगवश कहा थाः
एक बात और। मैंने समाज-सुधारकों के मुख-पत्र में पढ़ा कि मैं शुद्र हूं, और मुझसे पूछा गया था कि एक शुद्र को संन्यासी होने का क्या अधिकार है? तो इस पर मेरा उत्तर यह है कि मैं उन महापुरूष का वंशधर हूं, जिनके चरण्कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है, और जिनके वंशज विशुद्व क्षत्रिय है। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो,