योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

‘मेरा जीवन और ध्येय’ में इस प्रकार किया है:

‘‘इस तरह चलता रहा।...कभी रात के नौ बजे खा लिया, तो कभी सवेरे ही एक बार खाकर रह गए, तो दूसरी बार दो रोज़ के बाद खाया-तीसरी बार तीन रोज़ के बाद-और बार नितान्त रूखा-सूखा, शुष्क, नीरस भोजन। अधिकांश समय पैदल ही चलते, बर्फीली चोटियों पर चढ़ते, कभी-कभी तो दस-दस मील पहाड़ पर चढ़ते ही जाते, केवल इसलिए कि एक बार का भोजन मिल जाए। बताइए, भिखारी को भला, कौन अपना अच्छा भोजन देता है? फिर सूखी


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‘मेरा जीवन और ध्येय’ में इस प्रकार किया है:

‘‘इस तरह चलता रहा।...कभी रात के नौ बजे खा लिया, तो कभी सवेरे ही एक बार खाकर रह गए, तो दूसरी बार दो रोज़ के बाद खाया-तीसरी बार तीन रोज़ के बाद-और बार नितान्त रूखा-सूखा, शुष्क, नीरस भोजन। अधिकांश समय पैदल ही चलते, बर्फीली चोटियों पर चढ़ते, कभी-कभी तो दस-दस मील पहाड़ पर चढ़ते ही जाते, केवल इसलिए कि एक बार का भोजन मिल जाए। बताइए, भिखारी को भला, कौन अपना अच्छा भोजन देता है? फिर सूखी


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