योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

रोटी ही भारत में उनका भोजन है और कई बार तो सूखी रोटियां बीस-बीस, तीस-तीस दिन के लिए इकट्ठी करके रख ली जाती हैं। और जब वे ईंट की नाई कड़ी हो जाती हैं, तब उनसे षड्यंत्र व्यंजन का उपभोग सम्पन्न होता है। एक बार का भोजन पाने के लिए मुझे द्वार-द्वार भीख मांगते फिरना पड़ता था। सच कहूं, वैसी रोटी से आप अपने दांत तोड़ सकते हैं। मैं तो रोटी को एक पात्र में रख देता और उसमें नदी का पानी उंडेल देता। इस तरह महीनों गुज़ारने पड़े। पर मेरा स्वास्थ्य गिरता रहा।’’(वि.सा.)


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रोटी ही भारत में उनका भोजन है और कई बार तो सूखी रोटियां बीस-बीस, तीस-तीस दिन के लिए इकट्ठी करके रख ली जाती हैं। और जब वे ईंट की नाई कड़ी हो जाती हैं, तब उनसे षड्यंत्र व्यंजन का उपभोग सम्पन्न होता है। एक बार का भोजन पाने के लिए मुझे द्वार-द्वार भीख मांगते फिरना पड़ता था। सच कहूं, वैसी रोटी से आप अपने दांत तोड़ सकते हैं। मैं तो रोटी को एक पात्र में रख देता और उसमें नदी का पानी उंडेल देता। इस तरह महीनों गुज़ारने पड़े। पर मेरा स्वास्थ्य गिरता रहा।’’(वि.सा.)


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