विवेकानन्द ने अपनी इस यात्रा में भारत की जनता को हर रूप में देखा। दलित और दरिद्र के झोंपड़ों ही मंे नहीं, वे राजे-महाराजाओं के प्रासाद-भवनों में भी रहे। जिन्होंने उन्हें फूलों की तरह रखा। विद्वानों के अतिथि बनकर उनके साथ ज्ञानचर्चा की और उनसे आदर-सम्मान पाया। वे चोर-उचक्कों तथा बटमारों की संगत में भी रहे और उनमंे ऐसे-ऐसे उदात्त चरित्र व्यक्ति देखें, जिन्हें अगर उचित वातावरण तथा अनुकूल परिस्थितियां मिल जाती तो जाने क्या से क्या हो जाते।
विवेकानन्द ने अपनी इस यात्रा में भारत की जनता को हर रूप में देखा। दलित और दरिद्र के झोंपड़ों ही मंे नहीं, वे राजे-महाराजाओं के प्रासाद-भवनों में भी रहे। जिन्होंने उन्हें फूलों की तरह रखा। विद्वानों के अतिथि बनकर उनके साथ ज्ञानचर्चा की और उनसे आदर-सम्मान पाया। वे चोर-उचक्कों तथा बटमारों की संगत में भी रहे और उनमंे ऐसे-ऐसे उदात्त चरित्र व्यक्ति देखें, जिन्हें अगर उचित वातावरण तथा अनुकूल परिस्थितियां मिल जाती तो जाने क्या से क्या हो जाते।