इस यात्रा में उन्होंने बहुत कुछ सीखा। इसके विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं। समझ लेने के लिए एक-दो घटनाएं होंगी।
खेतरी का राजा विवेकानन्द का भक्त बन गया। वे उसके पास रूके हुए थे। एक दिन राग-रंग की महफिल थी, जिसमें एक नर्तकी बाला को अपनी कला का अभिनय करना था। जब वह आई युवक संन्यासी उठकर दूसरे कमरे में चले गए, महाराजा के अनुरोध पर भी नहीं रूके। नर्तकी को यह तिरस्कार अखरा और उसने गाया:
‘‘प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो,
इस यात्रा में उन्होंने बहुत कुछ सीखा। इसके विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं। समझ लेने के लिए एक-दो घटनाएं होंगी।
खेतरी का राजा विवेकानन्द का भक्त बन गया। वे उसके पास रूके हुए थे। एक दिन राग-रंग की महफिल थी, जिसमें एक नर्तकी बाला को अपनी कला का अभिनय करना था। जब वह आई युवक संन्यासी उठकर दूसरे कमरे में चले गए, महाराजा के अनुरोध पर भी नहीं रूके। नर्तकी को यह तिरस्कार अखरा और उसने गाया:
‘‘प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो,